देश के प्रधानमंत्री का सहपाठी होना चाहिए? गुजरात निवासी असगर अली वोरा ने पिछले सप्ताह प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से मुलाकात की थी।

*असगर अली वोरा जैसी किस्मत कहां*
*******
अजीत कुमार प्राइम इंडिया न्यूज संवाददाता / दिल्ली
क्या भारत में न्याय हासिल करने के लिए देश के प्रधानमंत्री का सहपाठी होना चाहिए? गुजरात निवासी असगर अली वोरा ने पिछले सप्ताह प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी से मुलाकात की थी। मैं पिछले सप्ताह एक मंडल आयुक्त के कार्यालय में बैठकर जनसुनवाई का आनंद ले रहा था। लंबी-लंबी दूरी से आने वाले फरियादियों की समस्याएं बहुत बड़ी नहीं थीं परन्तु लेखपाल, पुलिस थाने, एसडीएम आदि-आदि से होकर बेहद लंबी हो गई थीं। एक पचास गज भूमि पर कब्जे को लेकर दीन-हीन मां बेटा मंडल आयुक्त से न्याय की गुहार लगाने आए थे। बेहद विनम्र और जनहितैषी मंडल आयुक्त महोदय ने उनकी समस्या गंभीरता से सुनी और संबंधित अधिकारी को फोन कर आवश्यक कार्रवाई करने के सख्त आदेश दिए। मैंने पूछा, क्या यह मामला थाना तहसील पर नहीं निपट जाना चाहिए था?असगर अली और मोदी बचपन में सहपाठी रहे हैं। वो वोरा समुदाय से हैं जो मुस्लिम समाज की एक शाखा होने के बावजूद गुजरात में मोदी के समर्थन में दृढ़ता से खड़े हैं। असगर अली की गुजरात के भायंदर स्थित नवघर इलाके में 2810 वर्गमीटर भूमि पर भाजपा के एक विधायक नरेंद्र मेहता की कंपनी ने अवैध कब्जा किया हुआ था। दोनों के बीच कानूनी और प्रशासनिक स्तर पर विवाद चल रहे थे। विधायक से एक आम आदमी कैसे जीत सकता है। परंतु प्रधानमंत्री के सहपाठी के समक्ष विधायक की क्या औकात। असगर अली वोरा इधर प्रधानमंत्री से मिले और उधर विधायक भूमि पर अपना दावा और कब्जा छोड़कर एक तरफ खड़ा हो गया। इस त्वरित कार्रवाई के पीछे कई पारिस्थितिक कारण हो सकते हैं। इनमें गुजरात चुनाव से पहले एक बार फिर वोरा समुदाय का विश्वास जीतना सबसे प्रमुख कारण हो सकता है। हालांकि प्रधानमंत्री का सम्मान सर्वोच्च होता है परंतु यदि यह मामला किसी गैर भाजपा शासित राज्य में किसी अन्य दल के विधायक से संबंधित होता तो भी क्या परिणाम इतना त्वरित और सकारात्मक हो सकता था? यह एक काल्पनिक प्रश्न है जिसका उत्तर देश-काल और परिस्थितियां देंगी। मैं केवल असगर अली वोरा की किस्मत से ईर्ष्या कर सकता हूं।उनका वोरा समुदाय से संबंध, प्रधानमंत्री के साथ सहपाठी संबंध और गुजरात निवासी होना हर देशवासी के भाग्य में कहां। मंडल आयुक्त की जनसुनवाई में पहुंचने वाले दीन हीन मां बेटा हों या असगर अली,देश में न्याय हासिल करने के लिए लंबी लड़ाई और ऊंची चढ़ाई की आवश्यकता समाप्त नहीं होती।(नेक दृष्टि)(ऐसे ही अन्य समाचारों आलेख के लिए हमारी वेबसाइट www.nekdristi.com देखें)
