जीवनरक्षक दवाइयों की कमी के आरोप, ऑपरेशन से पहले परिजनों के हाथ थमाई जा रही बाहर की पर्ची? गेट पर धरने से गरमाया मामला ।

LBS अस्पताल में इलाज नहीं, मरीजों की मजबूरी का इम्तिहान!
जीवनरक्षक दवाइयों की कमी के आरोप, ऑपरेशन से पहले परिजनों के हाथ थमाई जा रही बाहर की पर्ची? गेट पर धरने से गरमाया मामला ।
प्राइम इंडिया न्यूज अजीत कुमार दिल्ली
पूर्वी दिल्ली। बीमारी से जूझता मरीज जब सरकारी अस्पताल की चौखट पर पहुंचता है तो उसके साथ उम्मीद होती है कि इलाज मिलेगा और जरूरी दवाइयां अस्पताल से ही उपलब्ध होंगी। लेकिन लाल बहादुर शास्त्री अस्पताल को लेकर सामने आए आरोपों ने इस उम्मीद पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। अस्पताल में कथित अव्यवस्थाओं, दवाइयों की कमी और मरीजों के परिजनों को जरूरी सामान बाहर से खरीदने के लिए कहे जाने के आरोपों को लेकर कांग्रेस के पूर्व दिल्ली प्रदेश अध्यक्ष अनिल चौधरी समर्थकों के साथ अस्पताल के बाहर धरने पर बैठ गए।
अनिल चौधरी ने आरोप लगाया कि अस्पताल में पिछले कई वर्षों से जीवनरक्षक दवाइयों की पर्याप्त उपलब्धता नहीं है। उनका दावा है कि दवाइयों का स्टॉक आने के कुछ ही दिनों में खत्म हो जाता है और इसके बाद मरीजों के परिजनों को बाजार से दवाइयां खरीदने के लिए मजबूर होना पड़ता है। सवाल यह है कि इलाज के लिए सरकारी अस्पताल पर निर्भर गरीब परिवार अगर दवाइयों के लिए भी जेब ढीली करने को मजबूर हो, तो उसकी परेशानी कौन समझेगा?
आरोपों के मुताबिक, ऑपरेशन के लिए अस्पताल पहुंचे मरीजों के परिजनों से ग्लूकोज की बोतल, कॉटन, ऑपरेशन में इस्तेमाल होने वाली टेप, इंजेक्शन और अन्य आवश्यक सामान बाहर से लाने के लिए कहा जाता है। बीमारी के साथ आर्थिक संकट झेल रहे परिवारों के लिए यह अतिरिक्त खर्च कितना भारी पड़ता है, इसका अंदाजा उसी परिवार को होता है जो इलाज के इंतजाम में अपनी जमा-पूंजी तक खर्च कर देता है।
अनिल चौधरी के अनुसार उन्होंने लगातार दो दिनों तक अस्पताल का दौरा कर व्यवस्थाओं का जायजा लिया। उन्होंने अस्पताल परिसर में आवारा कुत्तों की मौजूदगी और अन्य कथित अव्यवस्थाओं को लेकर भी सवाल उठाए। इसके साथ ही पीडब्ल्यूडी द्वारा अस्पताल में बार-बार कराए जा रहे कार्यों पर सवाल उठाते हुए सरकारी धन के इस्तेमाल की जांच की मांग की।
धरने के दौरान चौधरी ने अस्पताल के मेडिकल सुपरिंटेंडेंट डॉ. अखिलेश वर्मा से मुलाकात की मांग की। चौधरी का आरोप है कि अस्पताल प्रशासन ने उनसे बातचीत करने के बजाय गेट बंद कर दिए। इसके बाद वे समर्थकों के साथ अस्पताल के गेट के बाहर ही धरने पर बैठ गए।
अब सवाल सिर्फ धरने का नहीं, मरीजों की मजबूरी का है। अगर अस्पताल में दवाइयां उपलब्ध नहीं हैं तो स्टॉक की निगरानी कौन कर रहा है? अगर मरीजों से जरूरी सामान बाहर से मंगाया जा रहा है तो अस्पताल की खरीद व्यवस्था क्या कहती है? दवाइयां बार-बार खत्म होने की शिकायतों पर अब तक क्या कार्रवाई हुई? और अस्पताल में पीडब्ल्यूडी के बार-बार होने वाले कार्यों की जरूरत और खर्च का हिसाब कौन देगा?
लाल बहादुर शास्त्री अस्पताल से जुड़े इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि अभी नहीं हुई है। ऐसे में अस्पताल प्रशासन और संबंधित विभाग का पक्ष बेहद महत्वपूर्ण है। मरीजों और उनके परिजनों की परेशानी को देखते हुए दवाइयों की उपलब्धता, जरूरी चिकित्सा सामग्री और अस्पताल की व्यवस्थाओं की जांच कर स्थिति स्पष्ट करना जरूरी है।
