लाल किले की छाया में विकास का दावा बेनकाब? अंगूरी बाग के नगर निगम स्कूल की तस्वीरों ने शासन-प्रशासन से मांगा हिसाब

लाल किले की छाया में विकास का दावा बेनकाब? अंगूरी बाग के नगर निगम स्कूल की तस्वीरों ने शासन-प्रशासन से मांगा हिसाब
स्वच्छ भारत के नारों से लेकर विकास के दावों तक जनता का सवाल एक ही, सरकारी स्कूल की यह हालत किसकी जवाबदेही है और विकास के नाम पर खर्च होने वाला पैसा आखिर जमीन पर कहां दिखाई दे रहा है?
प्राइम इंडिया न्यूज संवाददाता अजीत कुमार दिल्ली
दिल्ली के ऐतिहासिक चांदनी चौक और लाल किले के बीच स्थित अंगूरी बाग नगर निगम स्कूल की सामने आई तस्वीरों ने दिल्ली के शासन-प्रशासन और जनप्रतिनिधियों के उन तमाम विकास एवं स्वच्छता संबंधी दावों पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है। जिस शहर को स्वच्छ, सुंदर और विकसित बनाने के दावे किए जाते हैं, उसी शहर में बच्चों से जुड़े एक नगर निगम स्कूल की व्यवस्था अगर तस्वीरों में सवालों के घेरे में नजर आती है, तो इसे महज एक छोटी स्थानीय समस्या बताकर पल्ला झाड़ना जनता के सवालों से बचने जैसा होगा।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि विकास के नाम पर सरकारी धनराशि खर्च होने के बावजूद यदि किसी सरकारी स्कूल की स्थिति संतोषजनक नहीं है, तो आखिर निगरानी का तंत्र कहां है? निगम पार्षद से लेकर संबंधित निगम अधिकारी, विधायक, सांसद और शासन-प्रशासन तक आखिर कौन यह सुनिश्चित कर रहा है कि जनता के पैसे से होने वाले विकास कार्य वास्तव में जमीन पर दिखाई दें।
सरकारी फंड कहां से आया, किस मद में स्वीकृत हुआ, कितना खर्च किया गया, किस एजेंसी या विभाग को जिम्मेदारी दी गई और उस काम की गुणवत्ता की जांच किस स्तर पर हुई इन सवालों के जवाब सार्वजनिक रिकॉर्ड और जमीन पर दिखाई देने चाहिए।
यहां सवाल किसी व्यक्ति विशेष पर आरोप लगाने का नहीं, बल्कि उस पूरी व्यवस्था से जवाब मांगने का है जो जनता के पैसे से चलती है और जनता को ही अपनी सुविधाओं के लिए जवाबदेही मांगनी पड़ती है। यदि अंगूरी बाग नगर निगम स्कूल में वास्तव में सफाई, रखरखाव या बुनियादी सुविधाओं की कमी है, तो संबंधित अधिकारियों को तत्काल मौके पर पहुंचकर स्थिति की जांच करनी चाहिए और यह सार्वजनिक करना चाहिए कि इस स्कूल के रखरखाव के लिए अब तक क्या-क्या कार्य हुए और उन पर कितनी धनराशि खर्च की गई।
स्वच्छ भारत अभियान केवल झाड़ू उठाकर तस्वीर खिंचवाने या मंच से भाषण देने का नाम नहीं हो सकता। इसकी असली परीक्षा उन सरकारी स्कूलों, गलियों और सार्वजनिक स्थानों पर होती है जहां आम आदमी और उसके बच्चे रोज पहुंचते हैं। अगर सरकारी स्कूल का वातावरण ही सवालों के घेरे में खड़ा हो जाए तो शासन-प्रशासन को यह बताना होगा कि स्वच्छता और विकास के दावों की वास्तविक निगरानी आखिर किस स्तर पर हो रही है।
अंगूरी बाग चांदनी चौक और लाल किले जैसे ऐतिहासिक क्षेत्र से जुड़ा इलाका है। ऐसे क्षेत्र में सरकारी स्कूल की व्यवस्था पर उठ रहे सवालों को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए। संबंधित विभाग को मौके का निरीक्षण कर वास्तविक स्थिति सामने रखनी चाहिए और यदि कहीं लापरवाही सामने आती है तो जिम्मेदारी तय करनी चाहिए।
सवाल बिल्कुल सीधा है जनता विकास के नाम पर पैसा देती है, सरकारें और स्थानीय निकाय उस पैसे को योजनाओं पर खर्च करते हैं और जनप्रतिनिधि विकास के दावे करते हैं, तो फिर उस विकास की वास्तविक तस्वीर जनता को क्यों न दिखाई जाए?
अंगूरी बाग नगर निगम स्कूल की तस्वीरें यदि वर्तमान स्थिति को दर्शाती हैं, तो शासन-प्रशासन को अब चुप्पी नहीं बल्कि निरीक्षण, रिकॉर्ड और जवाब के साथ सामने आना चाहिए।
जनता को भाषण नहीं चाहिए उसे अपने पैसे का हिसाब और अपने बच्चों के लिए सम्मानजनक, स्वच्छ एवं सुरक्षित सरकारी स्कूल चाहिए। अब देखना यह है कि इस खबर के बाद संबंधित विभाग जागता है या फिर यह मामला भी सरकारी फाइलों के नीचे दबकर रह जाता है।
