क्या सत्ता से सवाल पूछना अब इतना बड़ा अपराध हो गया है कि सवाल पूछने वाले को ही उठा लिया जाए

आधी रात की कार्रवाई, सुबह का सवाल: आखिर कुलदीप कुमार ही क्यों ?
गरीब परिवार के हक की आवाज उठाने वाले विधायक को तड़के घर से ले जाने पर उठे गंभीर सवाल—क्या कानून की लाठी भी अब राजनीतिक पहचान देखकर चलती है?
दिल्ली मे कल्याणपुरी के सफाई कर्मचारी अनिल की हत्या के बाद उठी न्याय की आवाज अब एक बड़े सवाल में बदल गई है। सवाल सिर्फ एक विधायक को पुलिस द्वारा तड़के ले जाने का नहीं, बल्कि उस व्यवस्था का है जहां पीड़ित परिवार न्याय की गुहार लगा रहा है और उसके साथ खड़े जनप्रतिनिधि को ही पुलिस कार्रवाई का सामना करना पड़ रहा है ।
आम आदमी पार्टी के विधायक कुलदीप कुमार लगातार मृतक परिवार के साथ खड़े होकर न्याय की मांग कर रहे थे। इसी बीच मंगलवार सुबह करीब चार बजे उन्हें पुलिस द्वारा घर से ले जाने की बात सामने आई। इस कार्रवाई ने सियासी गलियारों से लेकर आम जनता तक कई सवाल खड़े कर दिए हैं।
आखिर इतनी सुबह ऐसी कौन-सी आपात स्थिति पैदा हो गई कि एक निर्वाचित विधायक को घर से ले जाना पड़ा?
अगर विधायक ने कानून तोड़ा था, प्रदर्शन के नियमों का उल्लंघन किया था या कोई अन्य कानूनी मामला था, तो सरकार और पुलिस को सामने आकर साफ-साफ बताना चाहिए कि आरोप क्या है, कार्रवाई किस कानूनी आधार पर हुई और उन्हें कहां ले जाया गया?
क्योंकि मामला सिर्फ कुलदीप कुमार का नहीं है।
मामला उस गरीब परिवार का है, जिसने अपना बेटा खोया है। मामला उन लोगों का है जो यह उम्मीद लेकर बैठे हैं कि सत्ता में बैठे लोग उनकी आवाज सुनेंगे। और मामला उस लोकतांत्रिक व्यवस्था का भी है, जिसमें जनता अपने प्रतिनिधि को इसलिए चुनती है ताकि जरूरत के वक्त वह उनके साथ खड़ा हो।
अब जनता सत्ता से पूछ रही है—क्या जनप्रतिनिधि का पीड़ित परिवार के साथ खड़ा होना भी अपराध है?
सबसे बड़ा सवाल यह भी है कि क्या कानून सबके लिए बराबर है?
अगर विपक्ष का विधायक सड़क पर उतरता है तो पुलिस कार्रवाई होती है, तो क्या सत्ता पक्ष के विधायक या अन्य प्रभावशाली जनप्रतिनिधि भी इसी तरह की कार्रवाई का सामना करते हैं? अगर नहीं, तो फिर जनता के मन में पक्षपात का सवाल उठना स्वाभाविक है।
यह सवाल किसी पार्टी के पक्ष या विपक्ष का नहीं, बल्कि कानून के एक समान इस्तेमाल का है।
कुलदीप कुमार सही हैं या गलत—इसका फैसला कानून और तथ्य करेंगे। लेकिन यदि उन पर कार्रवाई हुई है तो उसका कारण सार्वजनिक होना चाहिए। लोकतंत्र में सवाल पूछने वाले को जवाब देना शासन की जिम्मेदारी है।
आज तस्वीर बेहद विचित्र दिखाई देती है
एक तरफ अनिल का परिवार न्याय की प्रतीक्षा में है, दूसरी तरफ उनके पक्ष में आवाज उठाने वाला विधायक पुलिस कार्रवाई के घेरे में है।
यही वह तस्वीर है जो जनता को सोचने पर मजबूर कर रही है।
क्या सत्ता से सवाल पूछना अब इतना बड़ा अपराध हो गया है कि सवाल पूछने वाले को ही उठा लिया जाए?
सरकार चाहे तो इस पूरे विवाद को एक झटके में खत्म कर सकती है—बस जनता के सामने तथ्य रख दे।
कुलदीप कुमार को क्यों ले जाया गया?
किस आदेश के तहत ले जाया गया?
उन्हें कहां रखा गया?
उन पर कौन-सी कार्रवाई की गई?
और सबसे महत्वपूर्ण—क्या यही पैमाना हर जनप्रतिनिधि के लिए लागू होता है?
क्योंकि लोकतंत्र में पुलिस की कार्रवाई से ज्यादा ताकतवर एक चीज होती है—जनता का सवाल।
और इस वक्त जनता का सवाल बिल्कुल साफ है—
“अगर गरीब की आवाज उठाना गुनाह है, तो फिर उस गुनाह की सजा सिर्फ एक विधायक को क्यों?”
अब निगाहें सरकार और पुलिस के जवाब पर हैं। क्योंकि चुप्पी जितनी लंबी होगी, सवाल उतने ही गहरे होते जाएंगे।
