यह सत्ता का अहंकार नहीं, बल्कि देश के नवनिर्माण के लिए सभी विचारधाराओं को साथ लेकर चलने की दूरदर्शिता थी।

वर्ष 1947 में जब देश आजाद हुआ, तब पंडित जवाहरलाल नेहरू के पास 364 सीटों के साथ पूर्ण बहुमत था और सामने विपक्ष न के बराबर था। इसके बावजूद नेहरू जी ने देश के पहले मंत्रिमंडल (1947) में विपक्ष के बड़े चेहरे डॉ. बी.आर. अंबेडकर को देश का पहला कानून मंत्री बनाया और श्यामा प्रसाद मुखर्जी को उद्योग एवं आपूर्ति मंत्री का पद सौंपा।
यह सत्ता का अहंकार नहीं, बल्कि देश के नवनिर्माण के लिए सभी विचारधाराओं को साथ लेकर चलने की दूरदर्शिता थी।
नेहरू जी विपक्ष के नेताओं के विचारों और उनकी आलोचनाओं को किस कदर सम्मान देते थे, इसका प्रमाण 1952 के बाद की संसदीय बहसों में मिलता है। जब अटल बिहारी वाजपेयी जी नए-नए सांसद बनकर आए थे, तो उनके तीखे और धारदार भाषणों को नेहरू जी पूरी तन्मयता से सुनते थे।
एक बार संसद में वाजपेयी जी ने नेहरू जी की विदेश नीति की कड़वी आलोचना की, जिसके जवाब में नेहरू जी ने न तो उन पर देशद्रोह का थप्पा लगाया और न ही माइक बंद करवाया, बल्कि भाषण के बाद उनसे मिलकर पीठ थपथपाई और कहा कि यह नौजवान एक दिन देश का प्रधानमंत्री बनेगा।
1962 के भारत-चीन युद्ध के दौरान जब देश संकट में था, तब विपक्ष के पास केवल 20-25 सांसदों का छोटा समूह था। इसके बावजूद अटल बिहारी वाजपेयी और विपक्ष की मांग पर पंडित नेहरू ने युद्ध के दौरान ही 8 नवंबर 1962 को संसद का विशेष सत्र बुलाया था।
उस सत्र में 100 से अधिक सांसदों ने सरकार की नीतियों पर खुलकर सवाल दागे, तीखे कटाक्ष किए, लेकिन सरकार ने एक भी सांसद को न तो निलंबित किया और ना ही देशद्रोही ठहराया।
1963 में जब आचार्य कृपलानी सरकार के खिलाफ देश का पहला अविश्वास प्रस्ताव लेकर आए, तब कांग्रेस के पास 361 से अधिक सीटें थीं और प्रस्ताव के पक्ष में केवल 62 वोट थे। इसके बावजूद नेहरू जी ने 4 दिनों तक संसद में पूरी चर्चा करवाई और अविश्वास प्रस्ताव का स्वागत करते हुए कहा कि विपक्ष का यह कदम लोकतंत्र को जीवंत और सरकार को सतर्क बनाए रखने के लिए बेहद जरूरी है।
वर्ष 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के समय, जब देश ने बांग्लादेश को आजाद कराया था, तब अटल बिहारी वाजपेयी जी ने इंदिरा गांधी के ऐतिहासिक नेतृत्व की सराहना की थी। वहीं दूसरी ओर, इंदिरा गांधी ने भी अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भारत का पक्ष रखने के लिए विपक्ष के नेताओं को विदेशी मंडलों और प्रतिनिधिमंडलों का नेतृत्व करने भेजा।
वर्ष 1977 में जब पहली गैर-कांग्रेसी जनता पार्टी सरकार बनी और अटल बिहारी वाजपेयी विदेश मंत्री बने, तो विदेश मंत्रालय के गलियारे से पंडित नेहरू की तस्वीर हटा दी गई थी। जब वाजपेयी जी ने यह देखा, तो उन्होंने तत्काल अधिकारियों को निर्देश देकर नेहरू जी की वह तस्वीर सम्मानपूर्वक वापस उसी स्थान पर लगवाई।
यह उस दौर के नेताओं के दिल का बड़प्पन और एक-दूसरे के प्रति असीम राजनीतिक सम्मान का प्रत्यक्ष प्रमाण था।
1984 के चुनावों में कांग्रेस ने इतिहास की सबसे बड़ी जीत हासिल करते हुए 404 सीटें जीती थीं और भाजपा के पास केवल 2 सीटें बची थीं। प्रचंड बहुमत होने के बावजूद राजीव गांधी ने कभी 2 सीटों वाले विपक्ष का उपहास नहीं उड़ाया।
जब राजीव गांधी को पता चला कि विपक्ष के युवा नेता अटल बिहारी वाजपेयी गुर्दे की गंभीर बीमारी से पीड़ित हैं और उनके पास इलाज के लिए न्यूयॉर्क जाने के पर्याप्त साधन नहीं हैं, तो राजीव गांधी ने एक संवेदनशील और महान मिसाल कायम की।
राजीव गांधी ने अटल जी को अपने कार्यालय में बुलाया और उन्हें संयुक्त राष्ट्र (UN) जाने वाले भारतीय प्रतिनिधिमंडल में शामिल कर दिया, ताकि सरकारी खर्चे पर न्यूयॉर्क में उनका सही इलाज हो सके।
अटल जी ने बाद में सार्वजनिक रूप से इस बात को स्वीकार किया था कि राजीव गांधी की वजह से ही उनकी जान बच सकी थी।
इसी तरह वर्ष 1991 से 1996 के दौरान जब डॉ. मनमोहन सिंह वित्त मंत्री थे और नरसिम्हा राव जी प्रधानमंत्री थे, तब देश अभूतपूर्व आर्थिक संकट से गुजर रहा था। भारत के पास केवल 3 हफ्ते का विदेशी मुद्रा भंडार (लगभग $1.2 बिलियन) बचा हुआ था।
उस वक्त सरकार के पास पूर्ण बहुमत नहीं था, लेकिन नरसिम्हा राव और डॉ. मनमोहन सिंह ने एलके आडवाणी, अटल बिहारी वाजपेयी और वामपंथी नेताओं के साथ लगातार 15 से अधिक बैठकें करके ऐतिहासिक आर्थिक उदारीकरण (LPG reforms) के बिलों को पास करवाया।
डॉ. मनमोहन सिंह के 10 साल के शासनकाल (2004-2014) में 2008 का भारत-अमेरिका परमाणु समझौता (Indo-US Nuclear Deal) एक ऐसा दौर था जब सरकार पर संकट मंडरा रहा था। वामपंथियों ने 59 सांसदों का समर्थन वापस ले लिया था, फिर भी संसद में हफ्तों तक तर्कपूर्ण बहस हुई।
डॉ. मनमोहन सिंह ने विपक्ष के हर तीखे सवाल का जवाब तथ्य और आंकड़ों के साथ दिया, लेकिन किसी भी विरोधी नेता को जेल भेजने या केंद्रीय एजेंसियों (CBI/ED) का भय दिखाने की कोशिश नहीं की।
पहले के दौर में पक्ष और विपक्ष केवल संसद तक सीमित नहीं थे; उनके बीच व्यक्तिगत, सामाजिक और आर्थिक संबंध बेहद मानवीय थे। विवाह समारोह हो, बीमारी हो या कोई निजी संकट, हर दल के नेता एक-दूसरे के घर आते-जाते थे।
आर्थिक संकट में व्यक्तिगत मदद तक की जाती थी और एक-दूसरे के स्वास्थ्य की चिंता की जाती थी। राजनीति केवल चुनावों की हार-जीत तक सीमित रहती थी, चुनाव खत्म होते ही देश के विकास के लिए सब एक साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़े हो जाते थे।
लेकिन वर्ष 2014 के बाद देश की राजनीतिक फिज़ा में ऐसा जहर घोल दिया गया है कि संवाद की जगह प्रतिशोध ने ले ली है। आज लोकतंत्र के मंदिर यानी संसद में तार्किक बहस की जगह विपक्ष की आवाज दबाने का काम किया जा रहा है।
आंकड़े गवाही देते हैं कि शीतकालीन सत्र 2023 में इतिहास में पहली बार एक ही सत्र में 146 सांसदों को संसद से निलंबित (Suspend) कर दिया गया, क्योंकि वे केवल देश के ज्वलंत मुद्दों पर सरकार से जवाब मांग रहे थे।
आज स्थिति यह हो चुकी है कि विपक्ष यदि संसद में सवाल पूछे तो उनका माइक बंद कर दिया जाता है; अगर बिना माइक के विरोध दर्ज कराएं तो सीधे निलंबित कर दिया जाता है। यदि विपक्ष सड़क पर उतरकर जनता के हक में धरना-प्रदर्शन करे तो उन्हें जेल की सलाखों के पीछे डाल दिया जाता है।
सत्ता के खिलाफ बोलने वाले, लिखने वाले और सवाल पूछने वाले पत्रकारों, सामाजिक कार्यकर्ताओं और नेताओं को सीधे ‘देशद्रोही’ या ‘पाकिस्तानी’ घोषित कर दिया जाता है।
वर्तमान दौर की भाषा और मर्यादा का स्तर इतना गिर चुका है कि देश के संवैधानिक पदों पर बैठे लोग विपक्षी दलों के शीर्ष नेताओं और महिला नेताओं के खिलाफ अभद्र टिप्पणियां करते नहीं हिचकिचाते।
सार्वजनिक मंचों से विपक्ष की राष्ट्रीय अध्यक्षों को ‘जर्सी गाय’, ‘कांग्रेस की विधवा’ या ‘बार में नाचने वाली’ जैसे अत्यंत आपत्तिजनक शब्दों से संबोधित किया जाता है। यह भारतीय संस्कृति और लोकतांत्रिक मूल्यों का सीधा अपमान है।
ईडी (ED) और सीबीआई (CBI) जैसी निष्पक्ष जांच एजेंसियों का जिस बड़े पैमाने पर राजनीतिक इस्तेमाल आज हो रहा है, वैसा इतिहास में कभी नहीं देखा गया। सरकारी आंकड़ों और मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, 2014 के बाद से ईडी द्वारा दर्ज किए गए मामलों में राजनीतिक नेताओं के खिलाफ कार्रवाई का आंकड़ा 95% तक पहुंच चुका है, जिनमें से लगभग सभी नेता विपक्षी दलों से ताल्लुक रखते हैं।
आश्चर्यजनक रूप से, जैसे ही कोई आरोपी नेता सत्ताधारी दल में शामिल होता है, उसके सारे मुकदमे ठंडे बस्ते में चले जाते हैं। आज देश में एक खतरनाक माहौल तैयार किया जा रहा है, जहां मुख्यधारा का मीडिया वास्तविक मुद्दों से ध्यान भटकाने के लिए दिन-रात ‘हिंदू खतरे में है’ का फर्जी नैरेटिव चलाता है।
जबकि कड़वी सच्चाई यह है कि इस देश में हिंदू या कोई धर्म खतरे में नहीं है, बल्कि देश का ‘लोकतंत्र’ और ‘संविधान’ खतरे में है। एक अघोषित आपातकाल की स्थिति पैदा कर दी गई है, जहां नागरिकों के मौलिक अधिकारों और सवाल पूछने की आजादी को छीना जा रहा है।
जिस देश में विपक्ष को खत्म कर दिया जाता है या जेलों में सड़ने के लिए छोड़ दिया जाता है, वहां लोकतंत्र का दम घुट जाता है और तानाशाही का जन्म होता है।
पिछले 70 सालों में इस देश की नींव सत्ता पक्ष और एक मजबूत, सम्मानित विपक्ष ने मिलकर रखी थी।
देश को आगे बढ़ाने के लिए अहंकार नहीं, बल्कि सबको साथ लेकर चलने की उस पुरानी लोकतांत्रिक नीयत और नीति की सख्त जरूरत है।
