अखिलेश यादव और राष्ट्रीय लोकदल (रालोद) के अध्यक्ष चौधरी जयंत सिंह के बीच सियासी टकराव कम होने का नाम नहीं ले रहा है ।

कभी सियासी दोस्त रहे समाजवादी पार्टी (सपा) के अध्यक्ष अखिलेश यादव और राष्ट्रीय लोकदल (रालोद) के अध्यक्ष चौधरी जयंत सिंह के बीच सियासी टकराव कम होने का नाम नहीं ले रहा।
सपा मुखिया जहां अपने 16 अगस्त के ‘चवन्नी से रुपया’ बनाने वाले बयान पर घेराबंदी होती देख टकराव के ट्रैक को टालकर सधी और शांत रणनीति के बल पर चौधरियों में सेंधमारी के प्लान पर आगे बढ़ रहे हैं, वहीं रालोद मुखिया किसी भी हालात में अखिलेश यादव पर हमले करने और घेराबंदी करने से नहीं चूक रहे हैं। अब सपा की नई रणभूमि आगरा बनने जा रहा है। सपा ने पहले से 15 अक्टूबर को आगरा में दलित सम्मेलन बुला रखा है। लेकिन सहारनपुर की तर्ज पर रालोद ने उससे तीन दिन पहले 12 अक्टूबर को आगरा (फतेहपुर सीकरी) में ही स्वाभिमान सम्मेलन बुला लिया है। सियासी जानकार इसे 2027 के चुनाव से पहले शक्ति प्रदर्शन के तौर पर देख रहे हैं।
साल 2022 का विधानसभा चुनाव सपा और रालोद ने मिलकर लड़ा था। 2017 में सिर्फ एक विधायक जिताने वाली पार्टी रालोद को इसका फायदा मिला था। उसके आठ विधायक जीते थे। बाद में उपचुनाव में विजय हासिल करके यह तादाद नौ हो गई थी। सपा की मदद से रालोद मुखिया राज्यसभा में भी चले गए थे। रालोद एक तरह से सपा से दोस्ती के बाद सियासी तौर पर ताकतवर माना जाने लगा था, लेकिन 2024 के लोकसभा चुनाव से पहले दोनों की दोस्ती टूट गई थी। जयंत ने भाजपा से दोस्ती कर ली थी। सपा कांग्रेस संग मिल गई थी। लेकिन 16 अगस्त 2026 को अखिलेश यादव के बयान कि, हमने चवन्नी को रुपया बना दिया, फिर भी हमें छोड़कर चले गए, ने दोनों नेताओं (जयंत-अखिलेश) और दलों के बीच तल्खी पैदा कर दी थी। इस बयान को जयंत से जोड़कर देखा गया। खुद जयंत ने इस बयान को जाट समाज के सम्मान और स्वाभिमान से जोड़कर सपा को घेरने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी।
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