November 2, 2026

प्रयागराज के तीन दरोगाओं का निलंबन सिर्फ एक घटना नहीं, एक ऐसा सच है जो यूपी पुलिस की पूरी व्यवस्था के भीतर झांकने पर मजबूर करता है।

प्रयागराज के तीन दरोगाओं का निलंबन सिर्फ एक घटना नहीं, एक ऐसा सच है जो यूपी पुलिस की पूरी व्यवस्था के भीतर झांकने पर मजबूर करता है।

प्रयागराज के तीन दरोगाओं का निलंबन सिर्फ एक घटना नहीं, एक ऐसा सच है जो यूपी पुलिस की पूरी व्यवस्था के भीतर झांकने पर मजबूर करता है। रीवा के विपिन पाठक अपनी शादी की खरीदारी के लिए अपने दोस्त के साथ प्रयागराज आए थे, उनकी कार में ख़रीदारी के लिए 6.55 लाख रुपये थे। नैनी में पुलिस ने जांच के बहाने रकम देखी, मन बहका, और विपिन पाठक को सीधे स्मैक बेचने के आरोप में अपराधी बना दिया गया । मुकदमे में 6.55 लाख नहीं, सिर्फ 87,500 रुपये की बरामदगी दिखाई गई और बाकी जीम लिए गए । मामले में जंग लगे तमंचे-पिस्टल “बरामद” बताए गए, संयोगवश जिन्हें अदालत ने चलने लायक नहीं पाया तो रिमांड की अर्जी खारिज की और पुलिस की भूमिका पर सवाल उठाया, और दोनों युवक जेल नहीं भेजे गए। कोर्ट के आदेश पर चली विभागीय जांच के बीच रकम वापस करने की बातचीत का ऑडियो सीनियर अफसरों तक पहुंचा—और तीनों दरोगा विक्की गुप्ता, रामानंद विश्वकर्मा और नीलेश कुमार सस्पेंड कर दिए गए।

 

यह मामला अकेला नहीं है। यूपी में पिछले कुछ वर्षों में “अर्ध-मुठभेड़” और फर्जी मुठभेड़ों का चलन इलाहाबाद हाईकोर्ट की बार-बार की कड़ी टिप्पणियों में सामने आया है—कोर्ट ने कहा कि घुटनों पर गोली मारकर उसे एनकाउंटर कहना “पूरी तरह अस्वीकार्य” है, और यह संदेह जताया कि ऐसा सिर्फ “अफसरों को खुश करने, समय से पहले प्रमोशन पाने या सोशल मीडिया पर वाहवाही” के लिए होता है।

 

गैरकानूनी हिरासत में चार दिन बंधक रखे गए एक व्यक्ति के भाई को कोर्ट ने 40 हजार रुपये मुआवजा दिलाया। सबूतों के बिना एक परिवार को “गैंगस्टर सिंडिकेट” बताकर गैंगस्टर एक्ट लगाने पर कोर्ट ने कहा कि अधिकारी “संविधान के नहीं, राजनीतिक आकाओं के वफादार” हो गए हैं। और NSA के दुरुपयोग पर तो जिलाधिकारी पर ही 5 लाख का जुर्माना लगा।

 

इस पूरी व्यवस्था की जड़ पर उत्तर प्रदेश के पूर्व DGP सुलखान सिंह ने सबसे तीखा सच कहा है—कि कुछ सरकारें और वरिष्ठ अधिकारी अधीनस्थों पर “अवैध दबाव” डालकर फर्जी मुठभेड़ करवाते हैं, लेकिन मामला फूटने पर वही आदेश देने वाले “कोई मदद नहीं करते” और पुलिसकर्मी “अपनी किस्मत के भरोसे” छूट जाता है। उन्होंने गाजीपुर में 22 साल और सीतापुर में 25 साल बाद मिली सजा की याद दिलाई, और बताया कि ऐसे मामलों में करीब 250 पुलिसकर्मी जेल में हैं, जिन्हें हाईकोर्ट से भी जमानत नहीं मिली।

 

प्रयागराज के इस ताजा मामले में भी उन्होंने 12 पुलिसकर्मियों पर FIR दर्ज होने की बात कही। सवाल यही है—जब सफलता का पैमाना मुठभेड़ों की गिनती और नेताओं की संतुष्टि बन जाए, तो कानूनी प्रक्रिया कब की तार-तार हो जाती है, किसी को पता ही नहीं चलता। कभी-कभी कोर्ट सबूतों की जांच में पुलिस को पकड़ती है, यह अच्छी बात है, लेकिन असली इलाज तो मूल्यांकन प्रणाली बदलने में है—मुठभेड़ों की संख्या नहीं, प्रक्रिया की वैधता और नागरिक अधिकारों की सुरक्षा तय करनी चाहिए कि कोई अफसर आगे बढ़े या नहीं।

 

तीन दरोगाओं का निलंबन सिर्फ एक सफाई है; सवाल उस व्यवस्था से है जो उन्हें ऐसा करने की हिम्मत देती है,

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