अखिलेश यादव के सहारनपुर दौरे से गरमाई सियासत, सपा की अंदरूनी खींचतान और कांग्रेस से गठबंधन पर टिकी निगाहें ।

अखिलेश यादव के सहारनपुर दौरे से गरमाई सियासत, सपा की अंदरूनी खींचतान और कांग्रेस से गठबंधन पर टिकी निगाहें ।
सहारनपुर। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 को लेकर पश्चिमी उत्तर प्रदेश की सियासत लगातार करवट ले रही है। सहारनपुर जनपद में समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के बीच संभावित गठबंधन, सीटों के बंटवारे और स्थानीय नेताओं के बीच राजनीतिक वर्चस्व की लड़ाई ने चुनावी माहौल को अभी से गरमा दिया है। ऐसे समय में सपा सुप्रीमो अखिलेश यादव का 2 सितंबर को सहारनपुर दौरा राजनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
बताया जा रहा है कि अखिलेश यादव अपने सहारनपुर दौरे के दौरान सबसे पहले स्टेट बैंक कॉलोनी स्थित चौधरी परिवार के आवास पर पहुंचेंगे। इसके बाद उनका पूर्व सांसद हाजी फजलुर्रहमान के आवास पर जाने का कार्यक्रम बताया जा रहा है। स्थानीय स्तर पर इन मुलाकातों को महज औपचारिक कार्यक्रम न मानकर सपा की आगामी रणनीति से जोड़कर देखा जा रहा है। अखिलेश यादव के सहारनपुर आगमन को लेकर पार्टी के भीतर भी राजनीतिक गतिविधियां तेज हो गई हैं।
*सपा के सामने सबसे बड़ी चुनौती—घर संभालना*
सहारनपुर की राजनीति में समाजवादी पार्टी के सामने इस समय सबसे बड़ा सवाल संगठनात्मक एकजुटता का है। राजनीतिक हलकों में चर्चा है कि जनपद में सपा अलग-अलग राजनीतिक खेमों में दिखाई दे रही है। एक ओर पार्टी के पुराने और प्रभावशाली चेहरे अपने-अपने राजनीतिक आधार को मजबूत करने में जुटे हैं, वहीं दूसरी ओर कई नेता आगामी विधानसभा चुनाव में टिकट की दावेदारी को लेकर सक्रिय नजर आ रहे हैं।
स्थिति का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि कई संभावित दावेदारों द्वारा अपने-अपने समर्थन और प्रत्याशी होने के संकेत देते हुए होर्डिंग लगाए जा रहे हैं। हालांकि पार्टी नेतृत्व ने अभी आधिकारिक रूप से किसी विधानसभा सीट पर प्रत्याशी घोषित नहीं किया है, लेकिन दावेदारों की सक्रियता से साफ है कि 2027 के टिकट की दौड़ अभी से शुरू हो चुकी है।
यही वजह है कि अखिलेश यादव का सहारनपुर दौरा पार्टी के लिए केवल जनसंपर्क कार्यक्रम नहीं बल्कि संगठन के भीतर चल रही राजनीतिक खींचतान को साधने की कोशिश के तौर पर भी देखा जा रहा है।
*सात विधानसभा सीटों पर जीत का लक्ष्य, लेकिन राह आसान नहीं*
सहारनपुर जनपद में विधानसभा की सात सीटें हैं और समाजवादी पार्टी की नजर निश्चित रूप से इन सभी सीटों पर मजबूत प्रदर्शन करने पर होगी। लेकिन सातों सीटों पर जीत दर्ज करना सपा के लिए बड़ी राजनीतिक चुनौती होगी।
स्थानीय राजनीति में जातीय समीकरण, मुस्लिम मतदाताओं का रुझान, ग्रामीण और शहरी वोट बैंक, स्थानीय प्रत्याशियों की व्यक्तिगत पकड़ तथा विपक्षी दलों के बीच सीटों का बंटवारा चुनाव परिणाम को प्रभावित करने वाले प्रमुख कारक होंगे।
सपा के लिए सबसे महत्वपूर्ण यह होगा कि पार्टी अपने सभी स्थानीय गुटों को एक मंच पर लाकर चुनावी मैदान में उतरे। यदि टिकट वितरण के समय असंतोष बढ़ा या किसी मजबूत दावेदार को नजरअंदाज किया गया तो इसका सीधा असर चुनावी परिणाम पर पड़ सकता है।
*इमरान मसूद ने बढ़ाई सपा की मुश्किल?*
दूसरी ओर कांग्रेस नेता और सांसद इमरान मसूद सहारनपुर की राजनीति में अपनी मजबूत व्यक्तिगत पकड़ बनाए हुए हैं। आगामी विधानसभा चुनाव में यदि सपा और कांग्रेस के बीच गठबंधन होता है तो सहारनपुर में सीटों के बंटवारे का सवाल सबसे ज्यादा दिलचस्प होने वाला है।
हाल ही में इमरान मसूद ने सीट बंटवारे को लेकर सपा के सामने कांग्रेस का रुख काफी स्पष्ट और सख्त अंदाज में रखा। उन्होंने कहा कि कांग्रेस अपने राजनीतिक हितों को नुकसान पहुंचाकर सपा की सरकार बनाने में सहयोग नहीं करेगी।
वहीं 19 अगस्त को सहारनपुर में एक बैठक के दौरान इमरान मसूद और सपा विधायक आशु मलिक के बीच हुई तीखी बहस ने भी दोनों दलों के बीच स्थानीय स्तर पर मौजूद राजनीतिक तनाव को उजागर किया था।
ऐसे में बड़ा सवाल यह है कि अगर 2027 में सपा-कांग्रेस गठबंधन होता है तो सहारनपुर की सात विधानसभा सीटों में किस दल को कितनी सीटें मिलेंगी?
*कौन सी सीट किसके खाते में जाएगी?*
यही सवाल इस समय सहारनपुर की सियासत का सबसे बड़ा राजनीतिक पहेली बना हुआ है।
यदि गठबंधन होता है तो कांग्रेस अपने प्रभाव वाले क्षेत्रों में मजबूत दावेदारी पेश कर सकती है। वहीं सपा भी अपनी संगठनात्मक ताकत और मौजूदा राजनीतिक समीकरणों के आधार पर ज्यादा से ज्यादा सीटों पर दावा कर सकती है।
ऐसे में टिकट वितरण का फॉर्मूला तय करना दोनों दलों के लिए आसान नहीं होगा। एक सीट पर अगर सपा और कांग्रेस दोनों के मजबूत दावेदार मौजूद हुए तो गठबंधन के बाद टिकट न मिलने वाले नेताओं को साधना नेतृत्व के लिए बड़ी चुनौती होगी।
इसके अलावा यह भी देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या स्थानीय स्तर के नेताओं और कार्यकर्ताओं को गठबंधन के फैसले पर पूरी तरह सहमत कराया जा सकेगा या नहीं।
*शायान मसूद की सपा में एंट्री से भी बदले समीकरण*
सहारनपुर की राजनीति में हाल में एक और महत्वपूर्ण घटनाक्रम देखने को मिला, जब इमरान मसूद के दामाद काजी शायान मसूद ने कांग्रेस छोड़कर समाजवादी पार्टी का दामन थाम लिया। इस घटनाक्रम को भी स्थानीय राजनीतिक समीकरणों में बदलाव के संकेत के रूप में देखा जा रहा है।
इससे सपा को जहां मुस्लिम समाज और युवा नेतृत्व के स्तर पर नया चेहरा मिला है, वहीं कांग्रेस के लिए यह राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण घटनाक्रम माना जा रहा है।
*अखिलेश की मुलाकातों पर टिकी निगाहें*
अखिलेश यादव के चौधरी परिवार और पूर्व सांसद हाजी फजलुर्रहमान से प्रस्तावित मुलाकातों को लेकर भी राजनीतिक चर्चाएं तेज हैं। सवाल यह है कि क्या सपा सुप्रीमो स्थानीय स्तर पर अलग-अलग राजनीतिक प्रभाव वाले नेताओं को एक मंच पर लाने की कोशिश करेंगे?
क्या अखिलेश यादव सहारनपुर संगठन में चल रही खींचतान को खत्म करने का कोई संदेश देंगे?
क्या संभावित विधानसभा प्रत्याशियों को लेकर कोई संकेत मिलेगा?
और सबसे बड़ा सवाल—क्या कांग्रेस के साथ गठबंधन को लेकर सहारनपुर में सीटों का कोई प्रारंभिक राजनीतिक खाका तैयार हो चुका है?
इन सवालों के जवाब अखिलेश यादव के दौरे के बाद राजनीतिक तस्वीर को कुछ हद तक साफ कर सकते हैं।
*होर्डिंग की राजनीति ने बढ़ाई टिकट की बेचैनी*
सहारनपुर में चुनाव से काफी पहले ही संभावित प्रत्याशियों के होर्डिंग और प्रचार सामग्री दिखाई देना इस बात का संकेत है कि टिकट की राजनीतिक दौड़ तेज हो चुकी है।
हर दावेदार अपने राजनीतिक आधार, सामाजिक समीकरण और संगठन में अपनी सक्रियता को मजबूत करने में जुटा है। लेकिन अंतिम फैसला सपा नेतृत्व के हाथ में होगा।
यदि पार्टी ने मजबूत और सर्वमान्य प्रत्याशियों का चयन किया तथा स्थानीय गुटबाजी को नियंत्रित कर लिया तो सपा के लिए चुनावी मुकाबला मजबूत हो सकता है। लेकिन टिकट वितरण के बाद बगावत, निर्दलीय दावेदारी या भीतरघात जैसी स्थिति बनी तो पार्टी के सामने मुश्किलें खड़ी हो सकती हैं।
*2027 में असली मुकाबला सीटों से ज्यादा समीकरणों का होगा*
सहारनपुर में 2027 का चुनाव केवल भाजपा बनाम सपा या सपा बनाम कांग्रेस का मुकाबला नहीं रहने वाला। यहां प्रत्याशी की व्यक्तिगत पकड़, जातीय समीकरण, मुस्लिम मतों का ध्रुवीकरण, दलित और पिछड़े वर्ग के मतदाताओं का रुख, युवा मतदाताओं की पसंद और गठबंधन की रणनीति—सभी मिलकर परिणाम तय करेंगे।
सपा यदि सातों सीटों पर जीत का लक्ष्य लेकर चल रही है तो उसे सबसे पहले अपने घर के भीतर की राजनीतिक दूरियां कम करनी होंगी। इसके बाद कांग्रेस के साथ सीट बंटवारे और स्थानीय नेतृत्व के बीच तालमेल सबसे बड़ी परीक्षा होगी।
फिलहाल अखिलेश यादव के सहारनपुर दौरे ने एक बात साफ कर दी है कि 2027 का चुनाव भले अभी दूर हो, लेकिन सहारनपुर में उसकी सियासी बिसात बिछनी शुरू हो चुकी है।
अब देखना यह होगा कि अखिलेश यादव अपने दौरे से सपा के अलग-अलग राजनीतिक खेमों को कितना साध पाते हैं और कांग्रेस के साथ संभावित गठबंधन की स्थिति में सहारनपुर की सात सीटों का राजनीतिक गणित किस करवट बैठता है।
*ब्यूरो रिपोर्ट मोनू कुमार प्राइम इंडिया न्यूज सहारनपुर
