September 2, 2026

जिलाधिकारी की जनसुनवाई में सर्वाधिक संख्या पुलिस अधिकार क्षेत्र से संबंधित फरियादियों की ।

जिलाधिकारी की जनसुनवाई में सर्वाधिक संख्या पुलिस अधिकार क्षेत्र से संबंधित फरियादियों की ।

जिलाधिकारी की जनसुनवाई में सर्वाधिक संख्या पुलिस अधिकार क्षेत्र से संबंधित फरियादियों की ।
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राजेश कुमार
क्या ‘न्यूनतम सरकार और अधिकतम शासन’ का दावा केवल कहने सुनने तक सीमित है या इसका वास्तव में कोई महत्व है? जिलाधिकारी गौतमबुद्धनगर की प्रतिदिन होने वाली जनसुनवाई में हमेशा दस में से छः पीड़ित ऐसे आते हैं जिन्हें पुलिस से राहत मिलनी चाहिए।ये वो फरियादी होते हैं जिन्हें अपने पड़ोसी या कॉलोनीवासी से पानी फैलाने, कूड़ा डालने, भूमि पर अवैध कब्जा या अतिक्रमण जैसी समस्याएं होती हैं।

सामान्य जिला प्रशासन में इस प्रकार के विवाद पर कार्रवाई का अधिकार उपजिलाधिकारी के हाथों में होता है। कमिश्नरेट पुलिस वाले जनपदों में यह अधिकार पुलिस अधिकारियों में निहित हो जाता है। गौतमबुद्धनगर कमिश्नरेट पुलिस व्यवस्था वाला जनपद है। यहां शांति भंग होने से संबंधित मामलों में सुनवाई और कार्रवाई पुलिस अधिकारियों के अधिकार क्षेत्र में है।आम लोग और विशेष रूप से ग्रामीण लोग पहले भी और अब भी ऐसे मामलों को लेकर सर्वप्रथम पुलिस के पास जाते हैं परन्तु यदि पुलिस अधिकारी उनको यह कहकर टरका दें कि पहले किसी एसडीएम या मजिस्ट्रेट से लिखवाकर लाओ तो वे कहां जाएं? जिलाधिकारी गौतमबुद्धनगर की जनसुनवाई उस समय बहुत दिलचस्प हो जाती है जब पीड़ित उनसे न्याय की फरियाद करता है और वे उसे अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर बताकर पुलिस के पास जाने के लिए कहती हैं। दरअसल पीड़ित को यह विश्वास दिलाना बेहद कठिन हो जाता है कि जिले के सर्वोच्च अधिकारी के पास उसकी मामूली सी समस्या को हल करने का अधिकार ही नहीं है।उसे लगता है कि जिलाधिकारी भी उसे पुलिस की तरह टरका रही हैं। एक आम नागरिक को इससे क्या मतलब है कि कमिश्नरेट पुलिस व्यवस्था वाले जनपद में जिलाधिकारी सबकुछ नहीं होता है। हालांकि जिलाधिकारी मेधा रूपम तत्काल संबंधित पुलिस अधिकारियों से बात कर समस्या समाधान के लिए पीड़ित को पुलिस अधिकारियों के पास भेजती हैं परन्तु क्या यह मिनिमम गवर्नमेंट मैक्सिमम गवर्नेंस की भावना के अनुरूप होता है। कमिश्नरेट पुलिस व्यवस्था लागू करने का उद्देश्य विभिन्न समस्याओं के समाधान को एक स्थान पर केंद्रित करना था। यह अलग बात है कि कमिश्नरेट पुलिस में तैनात होने वाले अधिकारियों को या तो अपने अधिकारों का पता नहीं है या वे अपने अधिकारों का उपयोग कर नहीं रहे हैं।इसे जिला प्रशासन और कमिश्नरेट पुलिस के बीच एक ऐसे मैकेनिज्म का अभाव भी कहा जा सकता है जिसे इस व्यवस्था के साथ विकसित किया जाना चाहिए था और जो छः वर्षों में भी विकसित नहीं हो पाया है।(नेक दृष्टि)(ऐसे ही अन्य समाचारों आलेख के लिए हमारी वेबसाइट www.nekdristi.com देखें)

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