बच्चों के खाने में भी मिलावट! सरकार से सवाल—आखिर जनता जाए तो जाए कहाँ

बच्चों के खाने में भी मिलावट! सरकार से सवाल—आखिर जनता जाए तो जाए कहाँ?
देश में महंगाई ने आम आदमी की कमर तोड़ रखी है। माता-पिता अपने बच्चों के बेहतर स्वास्थ्य के लिए महंगे विटामिन और न्यूट्रिशन प्रोडक्ट खरीदते हैं। लेकिन जब वही उत्पाद नकली निकलने लगें, तो सवाल सिर्फ बाजार पर नहीं, सरकार की निगरानी और खाद्य सुरक्षा व्यवस्था पर भी उठना लाजिमी है।
दिल्ली के ओखला में नकली Bournvita बनाने वाली फैक्ट्री पकड़े जाने की खबर ने एक बार फिर देश के सामने बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है—आखिर बाजार में असली क्या बचा है?
होटल का खाना हो, पैक्ड खाद्य पदार्थ हों या बच्चों के स्वास्थ्य के नाम पर बिकने वाले उत्पाद—क्या इनकी नियमित और प्रभावी जांच हो रही है? अगर हो रही है, तो फिर नकली उत्पाद बनाने वाली फैक्ट्रियां चल कैसे रही हैं और ये सामान बाजार तक पहुंच कैसे रहा है?
सरकार से जनता का सीधा सवाल है—जब बच्चों के खाने तक में मिलावट का खतरा हो, तो आखिर जिम्मेदारी किसकी है? इसमें बच्चों की क्या गलती है कि उनके हिस्से में भी लापरवाही और मिलावट आ जाए?
क्या खाद्य सुरक्षा विभाग सिर्फ किसी फैक्ट्री के पकड़े जाने के बाद कार्रवाई करने के लिए है, या बाजार में पहुंचने से पहले ही ऐसे उत्पादों को रोकने की जिम्मेदारी भी उसकी है?
जनता महंगाई झेल रही है, अपनी कमाई का बड़ा हिस्सा परिवार के खाने और बच्चों के स्वास्थ्य पर खर्च कर रही है। ऐसे में अगर उसके भरोसे के साथ ही खिलवाड़ हो रहा है, तो यह सिर्फ मिलावट का मामला नहीं—यह व्यवस्था पर जनता के भरोसे का सवाल है।
सरकार को जवाब देना होगा—क्या देश में खाद्य सुरक्षा की निगरानी वास्तव में मजबूत है, या मिलावटखोरों को पकड़ने के लिए जनता के बच्चों के स्वास्थ्य से खिलवाड़ होने का इंतजार किया जाएगा?
अब सवाल सिर्फ यह नहीं कि नकली Bournvita बनाने वाली फैक्ट्री कौन चला रहा था। बड़ा सवाल यह है कि वह सामान बाजार तक पहुंचा कैसे और जिम्मेदार निगरानी तंत्र इतने समय तक कहां था?
