September 21, 2026

दलाल की गिरफ्तारी से आबकारी विभाग में भूचाल! कथित वसूली के खुलासे के बीच IAS रवि झा का तबादला ।

दलाल की गिरफ्तारी से आबकारी विभाग में भूचाल! कथित वसूली के खुलासे के बीच IAS रवि झा का तबादला ।

दलाल की गिरफ्तारी से आबकारी विभाग में भूचाल! कथित वसूली के खुलासे के बीच IAS रवि झा का तबादला ।

 

अधिकारी के नाम पर वसूली के दावे ने खड़े किए बड़े सवाल, तबादले के साथ रिलीविंग की जल्दबाजी पर भी उठीं उंगलियां अब जांच बताएगी असली खेल

 

नई दिल्ली। दिल्ली के आबकारी विभाग में कथित वसूली से जुड़े एक दलाल की गिरफ्तारी के बाद विभागीय कामकाज और अधिकारियों की जवाबदेही को लेकर सवालों का सिलसिला तेज हो गया है। दावा किया जा रहा है कि पकड़े गए कथित दलाल ने पूछताछ के दौरान एक अधिकारी के नाम पर वसूली किए जाने की बात कही। इसी कथित दावे के बाद आबकारी विभाग के तत्कालीन आयुक्त IAS रवि झा का नाम चर्चा में आने से मामला और संवेदनशील हो गया है। हालांकि, दलाल के कथित बयान में रवि झा का नाम होने तथा उनके लिए वसूली किए जाने के आरोपों की स्वतंत्र आधिकारिक पुष्टि अभी आवश्यक है।

 

मामले में चर्चा इसलिए भी तेज है क्योंकि रवि झा के अरुणाचल प्रदेश तबादले की खबर इसी घटनाक्रम के बीच सामने आई। सरकारी आबकारी विभाग के उपलब्ध रिकॉर्ड में रवि झा आबकारी आयुक्त के पद पर दर्ज रहे हैं। अब सवाल यह उठ रहा है कि यदि कथित वसूली मामले में किसी अधिकारी का नाम सामने आया था, तो क्या संबंधित अधिकारी की भूमिका की निष्पक्ष और स्वतंत्र जांच कराई जाएगी या फिर तबादले के साथ ही मामला ठंडे बस्ते में चला जाएगा?

 

सबसे बड़ा सवाल कथित दलाल से बरामद सामग्री और उसके बयानों को लेकर है। आखिर वह किन लोगों के संपर्क में था? किसके नाम पर रकम मांगी जाती थी? रकम कहां और किस माध्यम से पहुंचती थी? क्या मोबाइल फोन, कॉल रिकॉर्ड, बैंक लेन-देन अथवा अन्य डिजिटल साक्ष्यों से कथित वसूली के दावे की पुष्टि हो सकती है? यदि आरोप गलत हैं तो जांच के जरिए यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि किसी अधिकारी का नाम लेकर वसूली करने वाला व्यक्ति किसके इशारे पर ऐसा कर रहा था।

 

मामले में तबादले और रिलीव किए जाने की प्रक्रिया को लेकर भी सवाल उठना स्वाभाविक है। यदि किसी अधिकारी के खिलाफ कोई प्रथमदृष्टया आरोप या साक्ष्य नहीं है तो सरकार को जांच के जरिए स्थिति साफ करनी चाहिए, लेकिन यदि कथित दलाल के बयान में किसी अधिकारी की भूमिका का संकेत मिलता है तो जांच एजेंसी को उस पहलू की भी पूरी तरह पड़ताल करनी चाहिए। किसी भी व्यक्ति को केवल आरोप के आधार पर दोषी ठहराना उचित नहीं होगा, लेकिन आरोप सामने आने के बाद उसकी निष्पक्ष जांच न होना भी गंभीर प्रशासनिक सवाल पैदा कर सकता है।

 

रवि झा की भूमिका को लेकर एक और सवाल इसलिए उठ रहा है क्योंकि वह आबकारी आयुक्त के साथ-साथ मुख्यमंत्री कार्यालय से जुड़ी जिम्मेदारी भी संभाल चुके हैं। ऐसे में आबकारी विभाग में कथित वसूली का मामला केवल विभागीय कार्रवाई तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यह सवाल भी सामने आता है कि विभागीय निगरानी और जवाबदेही की व्यवस्था कितनी प्रभावी थी।

 

अब निगाहें सरकार और जांच एजेंसियों पर हैं। क्या कथित दलाल के बयान को जांच का आधार बनाकर उसके पीछे मौजूद पूरे नेटवर्क का पता लगाया जाएगा? क्या कथित वसूली में जिन अधिकारियों या प्रभावशाली लोगों के नाम सामने आए हैं, उनकी भूमिका की स्वतंत्र जांच होगी? और सबसे अहम

अगर किसी अधिकारी का नाम गलत तरीके से इस्तेमाल किया गया, तो उसके पीछे की साजिश भी सामने लाई जाएगी या नहीं?

 

फिलहाल इस पूरे प्रकरण में किसी व्यक्ति को दोषी ठहराने के बजाय निष्पक्ष जांच ही सबसे अहम कड़ी है। क्योंकि सवाल सिर्फ एक कथित दलाल की गिरफ्तारी का नहीं, बल्कि यह पता लगाने का है कि यदि आबकारी विभाग में वास्तव में किसी प्रकार की वसूली का नेटवर्क सक्रिय था, तो वह कितना बड़ा था और उसकी निगरानी करने वाली व्यवस्था आखिर कहां थी?

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