साहिल वाकोडे की मौत: मोबाइल के बहाने सच पर पर्दा नहीं डाला जा सकता ।

साहिल वाकोडे की मौत: मोबाइल के बहाने सच पर पर्दा नहीं डाला जा सकता।
यह केवल एक छात्र की मौत नहीं—यह उस व्यवस्था के सामने खड़ा सवाल है, जो नियमों की आड़ में मनुष्य की गरिमा को भूल जाती है
साहिल वाकोडे अब इस दुनिया में नहीं है।
लेकिन उसकी मौत के बाद उठे सवाल जिंदा हैं।
और इन सवालों को किसी मोबाइल फोन, ChatGPT या परीक्षा-अनुशासन की एक पंक्ति में दफन नहीं किया जा सकता।
आईआईटी बॉम्बे ने कहा कि परीक्षा के दौरान साहिल के पास मोबाइल था और उसने प्रश्नपत्र ChatGPT पर अपलोड कर उत्तर प्राप्त करने का प्रयास किया। दूसरी ओर, साहिल के परिवार ने जातिगत उत्पीड़न और मानसिक प्रताड़ना के गंभीर आरोप लगाए हैं। परिवार की शिकायत पर प्रोफेसर सूर्यनारायण डूला सहित अन्य के विरुद्ध आत्महत्या के लिए उकसाने और SC/ST अत्याचार निवारण कानून के तहत FIR दर्ज हुई है। मामला अब जांच के अधीन है।
यहीं से असली सवाल शुरू होता है।
*मोबाइल परीक्षा-कक्ष तक पहुँचा कैसे?*
जिस मोबाइल को लेकर आज पूरी कहानी साहिल के ऊपर केंद्रित की जा रही है, उसी मोबाइल को लेकर पहला सवाल IIT Bombay से होना चाहिए।
जब मोबाइल परीक्षा में प्रतिबंधित था, तो वह परीक्षा-कक्ष तक पहुँचा कैसे?
प्रवेश व्यवस्था क्या थी?
तलाशी हुई या नहीं?
मोबाइल जमा कराने की व्यवस्था क्या थी?
CCTV में क्या दर्ज है?
मोबाइल किस समय सक्रिय था?
उससे ChatGPT पर प्रश्नपत्र कब अपलोड हुआ?
क्या डिजिटल फोरेंसिक इसकी पुष्टि करती है?
और यदि संस्थान की सुरक्षा व्यवस्था में कोई चूक हुई, तो उसकी जवाबदेही किसकी है?
इन सवालों के उत्तर मिलने से पहले केवल यह कहना कि “साहिल नकल करते पकड़ा गया था”, पूरे प्रकरण का उत्तर नहीं है।
IIT Bombay के नियमों में परीक्षा के दौरान मोबाइल, टैबलेट, स्मार्टवॉच और अन्य अनधिकृत उपकरणों का उपयोग academic malpractice माना जाता है और उसके लिए गंभीर शैक्षणिक दंड का प्रावधान है।
*तो फिर सवाल और भी सीधा है*—
जिस नियम को लागू करने की जिम्मेदारी संस्थान की है, उस नियम के उल्लंघन का पूरा नैतिक और प्रशासनिक बोझ केवल मृत छात्र के सिर पर क्यों डाला जा रहा है?
नकल हुई तो प्रक्रिया कहाँ थी?
मान लीजिए साहिल ने परीक्षा में नियम तोड़ा।
तो कानून और संस्थागत नियमों के अनुसार कार्रवाई होनी चाहिए थी।
लेकिन कार्रवाई की भी एक प्रक्रिया होती है।
नोटिस।
रिकॉर्ड।
जांच।
अपील।
अनुशासनात्मक समिति।
और छात्र को अपना पक्ष रखने का अवसर।
IIT Bombay का कहना है कि साहिल के विरुद्ध तत्काल कोई disciplinary action शुरू नहीं किया गया था और उसे समझाया गया था। दूसरी ओर परिवार और कुछ छात्रों की ओर से suspension की धमकी और मानसिक दबाव के आरोप सामने आए हैं। यही विरोधाभास अब जांच का केंद्रीय विषय होना चाहिए।
किसने क्या कहा था?
किसके सामने कहा था?
किस समय कहा था?
क्या CCTV उपलब्ध है?
क्या दूसरे छात्र प्रत्यक्षदर्शी हैं?
क्या कोई संदेश या डिजिटल रिकॉर्ड है?
इन प्रश्नों का उत्तर चाहिए।
*जाति का प्रश्न उठते ही व्यवस्था असहज क्यों हो जाती है?*
यह प्रश्न किसी एक व्यक्ति की जाति पर नहीं है।
यह प्रश्न जातीय सत्ता-संरचना पर है।
भारत में जाति केवल गांव की चौपाल पर नहीं बैठती।
वह विश्वविद्यालय के गलियारों में भी दिखाई दे सकती है।
वह नियुक्ति की प्रक्रिया में दिखाई दे सकती है।
वह कक्षा के व्यवहार में दिखाई दे सकती है।
वह भाषा में दिखाई दे सकती है।
वह “मेरिट” की परिभाषा में दिखाई दे सकती है।
और कभी-कभी वह इतनी सभ्य भाषा बोलती है कि उसके भीतर छिपा हुआ पूर्वाग्रह पहचानना ही कठिन हो जाता है।
जातीय भेदभाव हमेशा गाली देकर नहीं होता।
कभी वह उपेक्षा बनकर आता है।
कभी अपमान बनकर।
कभी अविश्वास बनकर।
कभी “तुम यहां कैसे पहुंचे?” जैसे प्रश्न बनकर।
और कभी नियमों की ऐसी व्याख्या बनकर, जो व्यक्ति की सामाजिक पहचान के अनुसार बदलती हुई दिखाई दे।
इसीलिए साहिल के मामले में आरोपों की स्वतंत्र जांच आवश्यक है।
परंतु आरोप को तथ्य घोषित करना भी गलत होगा और आरोप को केवल इसलिए खारिज कर देना कि संस्थान प्रतिष्ठित है—यह भी न्याय नहीं होगा।
*प्रतिष्ठा बड़ी या छात्र का जीवन?*
आज IIT Bombay स्वयं एक गंभीर संकट से गुजर रहा है।
प्रोफेसर डूला को Dean पद से हटाया गया है। संस्थान ने अपने शुरुआती संचार के लिए माफी भी मांगी है। छात्रों ने 18 मांगें रखी हैं, जिनमें स्वतंत्र जांच, grievance redressal और student welfare में सुधार जैसी मांगें शामिल हैं।
इसका अर्थ यह नहीं कि किसी आरोपी को दोषी मान लिया गया।
लेकिन इसका अर्थ यह अवश्य है कि सवाल इतने गंभीर हो चुके हैं कि उन्हें केवल “एक छात्र ने परीक्षा में गलती की” कहकर बंद नहीं किया जा सकता।
और यही लोकतंत्र की खूबसूरती है।
संस्थान बड़ा हो सकता है।
प्रोफेसर बड़ा हो सकता है।
पद बड़ा हो सकता है।
लेकिन कानून और सत्य उससे बड़े हैं।
*दो तरह का न्याय नहीं चलेगा*
हम न तो यह चाहते हैं कि साहिल को देवदूत बनाकर प्रस्तुत किया जाए।
न यह कि किसी शिक्षक को बिना जांच अपराधी घोषित कर दिया जाए।
हम सिर्फ इतना चाहते हैं—
एक ही पैमाना सबके लिए हो।
यदि साहिल ने परीक्षा नियम तोड़ा—जांच हो।
यदि किसी शिक्षक ने जातिगत अपमान किया—जांच हो।
यदि किसी अधिकारी ने दबाव बनाया—जांच हो।
यदि संस्थान ने शिकायतों की अनदेखी की—जांच हो।
यदि आरोप झूठे हैं—जांच उन्हें झूठा साबित करे।
और यदि आरोप सही हैं—तो पद, प्रतिष्ठा और संस्थागत प्रभाव किसी को कानून से ऊपर न बचा सके।
यही न्याय है।
और यदि सच असुविधाजनक निकला तो?
यही वह प्रश्न है जिससे सत्ता हमेशा डरती है।
यदि जांच में सामने आता है कि साहिल के साथ जातिगत भेदभाव हुआ था, तो क्या “मोबाइल” उस तथ्य को ढक पाएगा?
नहीं।
यदि जांच में सामने आता है कि जातिगत उत्पीड़न का आरोप गलत था, तो क्या जांच के बाद यह बात स्पष्ट रूप से स्वीकार की जाएगी?
होनी चाहिए।
यदि परीक्षा व्यवस्था में गंभीर चूक सामने आती है, तो क्या जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय होगी?
होनी चाहिए।
सत्य किसी जाति का नहीं होता।
अपराध किसी पद का विशेषाधिकार नहीं होता।
और न्याय किसी संस्थान की प्रतिष्ठा का बंधक नहीं हो सकता।
*UGC और उच्च शिक्षा की पूरी व्यवस्था से सवाल*
साहिल का मामला अब केवल IIT Bombay का मामला नहीं रह गया है।
यह सवाल देश के प्रत्येक उच्च शिक्षण संस्थान से पूछा जाना चाहिए—
क्या SC/ST विद्यार्थियों के लिए शिकायत-निवारण तंत्र वास्तव में स्वतंत्र है?
क्या विद्यार्थी बिना भय के शिकायत कर सकता है?
क्या शिक्षक के विरुद्ध शिकायत करने पर विद्यार्थी की शैक्षणिक स्थिति प्रभावित होने से बचाने की व्यवस्था है?
क्या परीक्षा-अनुशासन में मानवीय गरिमा की पर्याप्त सुरक्षा है?
क्या मानसिक संकट के संकेतों पर तत्काल सहायता उपलब्ध है?
क्या संस्थान किसी घटना के बाद पहले अपनी प्रतिष्ठा बचाता है या पहले तथ्य सुरक्षित करता है?
और सबसे महत्वपूर्ण—
क्या विश्वविद्यालय वास्तव में समानता के संस्थान हैं, या केवल समानता की भाषा बोलने वाले संस्थान?
*साहिल के नाम पर हमारी मांग*
हम किसी को भी जांच से पहले दोषी घोषित नहीं करते।
लेकिन हम यह भी नहीं मानेंगे कि जांच के नाम पर सवालों को दबा दिया जाए।
हमारी मांग स्पष्ट है—
स्वतंत्र और समयबद्ध जांच हो।
साहिल के मोबाइल और सभी डिजिटल साक्ष्यों की फोरेंसिक जांच हो।
परीक्षा-कक्ष और प्रवेश व्यवस्था की CCTV फुटेज सुरक्षित की जाए।
सभी प्रत्यक्षदर्शी छात्रों के बयान लिए जाएं।
जातिगत उत्पीड़न के आरोपों की स्वतंत्र जांच हो।
SC/ST Cell की कार्यप्रणाली की भी समीक्षा हो।
साहिल की पूर्व शिकायतों, संदेशों और संस्थागत रिकॉर्ड की जांच हो।
परीक्षा अनुशासन की पूरी प्रक्रिया सार्वजनिक की जाए।
और जांच पूरी होने तक किसी भी पक्ष को मीडिया ट्रायल का लाभ न दिया जाए।
*यह लड़ाई किसी व्यक्ति के खिलाफ नहीं—एक व्यवस्था के खिलाफ सवाल है*
हमारी लड़ाई किसी एक प्रोफेसर की जाति से नहीं है।
हमारी लड़ाई उस जातीय दंभ से है, जो यदि कहीं मौजूद हो तो उसे पद, प्रतिष्ठा और संस्थागत शक्ति का कवच मिल जाता है।
हमारी लड़ाई उस मानसिकता से है जो कमजोर व्यक्ति से पहले उसके आचरण का प्रमाण मांगती है और शक्तिशाली व्यक्ति से पहले उसकी प्रतिष्ठा का हवाला देती है।
हमारी लड़ाई उस व्यवस्था से है जिसमें गरीब, वंचित या बहुजन पृष्ठभूमि से आया छात्र अक्सर अपने अधिकार के लिए अकेला पड़ सकता है।
और हमारी लड़ाई उस चुप्पी से है जो किसी छात्र की मृत्यु के बाद टूटती है—जबकि शायद उसे उसके जीवित रहते ही टूट जाना चाहिए था।
साहिल आज सवाल पूछने के लिए हमारे बीच नहीं है।
इसलिए अब सवाल हमें पूछना होगा।
बार-बार पूछना होगा।
निर्भीक होकर पूछना होगा।
मोबाइल आया कैसे?
दबाव किसने बनाया?
जातीय उत्पीड़न हुआ या नहीं?
किसने शिकायत सुनी?
किसने नहीं सुनी?
किसने क्या कहा?
कौन जिम्मेदार था?
और एक युवा जीवन उस अंतिम बिंदु तक कैसे पहुंचा?
*इन सवालों का जवाब चाहिए।*
क्योंकि साहिल की मौत को “नकल की घटना” बनाकर बंद कर देना केवल एक छात्र की कहानी को छोटा करना नहीं होगा—यह उस पूरे संस्थागत सच को छोटा करना होगा, जिसकी जांच आज देश मांग रहा है।
साहिल के लिए न्याय का अर्थ किसी निर्दोष को सजा देना नहीं है।
साहिल के लिए न्याय का अर्थ है—किसी दोषी को उसकी प्रतिष्ठा के कारण बचने न देना।
