वर्दी का रौब या कानून से खिलवाड़? वकील को थप्पड़ मारने का वीडियो वायरल, पुलिस की कार्यशैली कटघरे में !

वर्दी का रौब या कानून से खिलवाड़? वकील को थप्पड़ मारने का वीडियो वायरल, पुलिस की कार्यशैली कटघरे में!
सड़क पर गाड़ी खड़ी करने को लेकर विवाद, ट्रैफिक सीओ पर अधिवक्ता को थप्पड़ मारने का आरोप; सवाल कानून के रखवालों की जवाबदेही कौन तय करेगा?
अजमेर/किशनगढ़। राजस्थान के किशनगढ़ में ट्रैफिक सीओ अंजू यादव और अधिवक्ता बाबूलाल बागरिया के बीच वाहन खड़ा करने को लेकर हुए विवाद ने पुलिस के व्यवहार और कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो में महिला अधिकारी अधिवक्ता को थप्पड़ मारती दिखाई दे रही हैं। घटना ने खाकी की मर्यादा और आम नागरिकों के साथ पुलिस के व्यवहार को लेकर बहस छेड़ दी है।
कानून तोड़ने पर चालान काटिए, कानूनी कार्रवाई कीजिए लेकिन क्या वर्दी पहनने का मतलब किसी पर हाथ उठाने का अधिकार मिल जाना है? यदि वाहन गलत जगह खड़ा था, तो नियमों के तहत कार्रवाई के पर्याप्त रास्ते मौजूद थे। ऐसे में विवाद का थप्पड़ तक पहुँचना कई सवाल खड़े करता है। पुलिस से जनता कानून की रक्षा, निष्पक्षता और संयम की अपेक्षा करती है, न कि ऐसा व्यवहार जो पूरे विभाग की साख पर सवालिया निशान लगा दे।
खाकी की इज्जत ओहदे से नहीं, आचरण से बनती है। पुलिस का अधिकार जितना बड़ा है, उसकी जिम्मेदारी भी उतनी ही बड़ी है। किसी अधिकारी के व्यवहार पर सवाल उठने पर विभाग की जिम्मेदारी है कि वह तथ्यों को सामने लाए और निष्पक्ष जाँच सुनिश्चित करे। पूरे घटनाक्रम, विवाद की शुरुआत और दोनों पक्षों के बयान की पड़ताल आवश्यक है।
अब निगाहें पुलिस के वरिष्ठ अधिकारियों पर हैं। क्या वायरल वीडियो की निष्पक्ष जाँच कराई जाएगी? यदि जाँच में अनुचित व्यवहार की पुष्टि होती है, तो क्या संबंधित अधिकारी के खिलाफ नियमानुसार कार्रवाई होगी?
सीधा सवाल क्या कानून केवल आम नागरिकों के लिए है, या कानून लागू करने वाले भी उसी के प्रति जवाबदेह हैं? वर्दी सम्मान का प्रतीक है, मनमानी का लाइसेंस नहीं। पुलिस की साख बचाने का रास्ता सवाल दबाने में नहीं, बल्कि पारदर्शी जाँच और जवाबदेही सुनिश्चित करने में है।
