September 5, 2026

बरगदिया गाँव में भूख से लड़ रहा एक परिवार…मां की आंखों में आंसू, बच्चों की थाली में सिर्फ चावल-नमक

बरगदिया गाँव में भूख से लड़ रहा एक परिवार…मां की आंखों में आंसू, बच्चों की थाली में सिर्फ चावल-नमक

बरगदिया गाँव में भूख से लड़ रहा एक परिवार…मां की आंखों में आंसू, बच्चों की थाली में सिर्फ चावल-नमक ।

यह गरीबी नहीं, इंसानियत के मुंह पर तमाचा है!

प्राइम इंडिया न्यूज संवाददाता सतीश कुमार ।

अयोध्या के बरगदिया गाँव से सामने आई यह तस्वीर सिर्फ एक परिवार की कहानी नहीं है… यह उस भूख की कहानी है, जिसे देखकर शायद पत्थर दिल इंसान की आंखें भी नम हो जाएं।

एक तरफ देश विकास, तरक्की और खुशहाली की बातें करता है… लेकिन उसी देश के एक कोने में अर्पिता पांडे अपने तीन मासूम बच्चों के साथ जिंदगी नहीं, बल्कि हर दिन भूख के खिलाफ जंग लड़ रही हैं।

घर की हालत ऐसी कि उसे घर कहना भी शायद उस दर्द का अपमान होगा।

 

टूटी हुई दीवारें…

जर्जर छत…

हर तरफ बदहाली…

और उस खंडहर जैसे मकान के अंदर बैठी एक मां, जिसकी सबसे बड़ी मजबूरी यह है कि वह अपने बच्चों की भूख के सामने खुद को बेबस महसूस करती है।

 

न दाल… न सब्जी… न दूध… बस चावल, नमक और थोड़ा सा तेल!

 

सोचिए उस मां के दिल पर क्या गुजरती होगी, जब उसके तीन छोटे-छोटे बच्चे खाने की तरफ उम्मीद भरी नजरों से देखते होंगे और मां के पास उन्हें देने के लिए सिर्फ सूखे चावल, नमक और थोड़ा सा तेल होता होगा।

 

यह एक दिन की मजबूरी नहीं बताई जा रही…

 

यह भूख की वह लंबी लड़ाई है, जिसमें मासूम बच्चों की थाली से दाल गायब हो गई, सब्जी गायब हो गई, दूध गायब हो गया और बची सिर्फ जिंदा रहने की एक अधूरी कोशिश।

 

वह थाली शायद पेट भरने के लिए नहीं होती…

 

वह थाली सिर्फ इसलिए होती है कि बच्चे किसी तरह एक और दिन जिंदा रह सकें।

 

जब अर्पिता पांडे ने रोते हुए अपनी मजबूरी और अपने बच्चों की भूख का दर्द सुनाया, तो शब्द भी शायद छोटे पड़ गए।

 

एक मां आखिर कब रोती है?

 

जब उसके पास खुद के लिए कुछ न हो, तब भी वह सह लेती है…

 

लेकिन जब उसके बच्चों की आंखों में भूख दिखाई दे और वह चाहकर भी उन्हें एक वक्त की भरपेट रोटी, दाल या दूध न दे सके तब एक मां का कलेजा अंदर ही अंदर टूट जाता है।

 

बरगदिया गाँव के इस घर में सिर्फ गरीबी नहीं रहती… यहां बेबसी रहती है, मजबूरी रहती है और हर रात भूखे बच्चों की आंखों में सोने की कोशिश करती हुई एक मां की टूटी हुई उम्मीद रहती है।

 

आज जरूरत है कि हम सिर्फ इस खबर को पढ़कर आगे न बढ़ जाएं।

 

अगर आपके पास सामर्थ्य है…

अगर आप किसी जरूरतमंद की मदद कर सकते हैं…

अगर आपको लगता है कि किसी बच्चे को भूखे पेट नहीं सोना चाहिए…

 

तो अर्पिता पांडे और उनके तीन मासूम बच्चों तक मदद का हाथ जरूर पहुंचना चाहिए।

 

क्योंकि सवाल सिर्फ एक परिवार का नहीं है…

 

सवाल यह है कि क्या हम इतने संवेदनहीन हो चुके हैं कि किसी मां के आंसू और तीन मासूम बच्चों की भूख देखकर भी हमारी आत्मा न कांपे?

 

आज यह परिवार आपकी नजर में है।

 

कल शायद कोई और मां होगी…

कोई और टूटा हुआ घर होगा…

कोई और मासूम भूखे पेट सो रहा होगा…

 

लेकिन अगर आज हम चुप रहे, तो शायद आने वाले कई जन्मों तक हमारी आत्मा यही सवाल पूछती रहेगी

 

“जब तुम्हारे सामने बच्चे भूखे थे… तब तुमने आखिर क्या किया था?”

 

क्योंकि भूख की कोई जाति नहीं होती…

भूख का कोई धर्म नहीं होता…

भूखे बच्चे सिर्फ बच्चे होते हैं।

 

और किसी बच्चे की थाली खाली हो, तो सिर्फ उसका घर नहीं रोता… इंसानियत रोती है।

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