राजनीतिक विरोध के नाम पर संत और संवैधानिक पद का अपमान—आखिर यह कैसी राजनीति ?

राजनीतिक विरोध के नाम पर संत और संवैधानिक पद का अपमान—आखिर यह कैसी राजनीति ?
गोरक्षपीठाधीश्वर एवं उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री आदरणीय योगी आदित्यनाथ जी के प्रति नेहा बोरा की कथित अमर्यादित टिप्पणी की मैं कड़े शब्दों में निंदा करती हूँ।
योगी जी केवल उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री नहीं हैं। वे गोरक्षपीठ की गौरवशाली संत परंपरा के प्रतिनिधि हैं और देशभर में अपने तप, अनुशासन, राष्ट्रसेवा एवं सार्वजनिक जीवन की स्पष्ट प्रतिबद्धता के लिए व्यापक सम्मान रखते हैं। उनके व्यक्तित्व और पद की गरिमा से करोड़ों लोगों की आस्था और विश्वास जुड़ा हुआ है।
राजनीतिक मतभेद लोकतंत्र का स्वाभाविक हिस्सा हैं। नीतियों की आलोचना हो, सरकार से सवाल हों, वैचारिक विरोध हो—सबका स्वागत है। लेकिन किसी संत और संवैधानिक पद पर आसीन ऐसे जननेता को अमर्यादित भाषा में निशाना बनाना राजनीतिक असहमति नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक मर्यादा का अतिक्रमण है।
सवाल यह है—क्या तर्क समाप्त होने के बाद अपशब्द ही राजनीति की भाषा रह जाएगी?
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता लोकतंत्र की शक्ति है, लेकिन यह किसी सम्मानित व्यक्तित्व की गरिमा को ठेस पहुँचाने का अधिकार-पत्र नहीं है।
विरोध कीजिए—पर मर्यादा में।
सवाल कीजिए—पर तथ्यों के साथ।
राजनीति कीजिए—पर संस्कारों को साथ लेकर।
योगी आदित्यनाथ जी का व्यापक जन सम्मान किसी एक दल की सीमा में बंधा विषय नहीं है। उनके प्रति सम्मान संत परंपरा, सार्वजनिक जीवन की गरिमा और करोड़ों लोगों की आस्था से जुड़ा प्रश्न है।
अमर्यादित शब्द क्षणभर की सुर्खियाँ दे सकते हैं,
लेकिन व्यक्तित्व का सम्मान वर्षों की तपस्या, सेवा और कर्म से अर्जित होता है।
संत का सम्मान—समाज का सम्मान।
संवैधानिक गरिमा का सम्मान—लोकतंत्र का सम्मान।
नेहा बोरा को अपनी टिप्पणी पर सार्वजनिक रूप से माफी मांगनी चाहिए।
*रिचा भदोरिया वरिष्ठ भाजपा नेत्री गाजियाबाद*
